# filmalay.com > Indian and International Film Reviews ## Posts - [गुरु दत्त के शताब्दी वर्ष पर फ़िल्म प्रेमियों के लिए ख़ास तोहफ़ा देखिए उनकी क्लासिक फ़िल्में ख़ास रेट्रोस्पेक्टिव में](https://filmalay.com/guru-dutt-movies-to-be-restored-on-guru-dutts-100th-birth-anniversary/): जुलाई 2025: भारतीय सिनेमा के महान फ़िल्मकार गुरु दत्त की शताब्दी वर्ष के मौक़े पर फ़िल्म प्रेमियों के लिए एक ख़ास तोहफ़ा तैयार है। अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट 8 से 10 अगस्त तक देशभर के सिनेमाघरों में गुरु दत्त की कालजयी फिल्मों का एक विशेष रेट्रोस्पेक्टिव आयोजित कर रहा है। इस मौके पर दर्शकों को गुरु दत्त की क्लासिक फ़िल्म ‘प्यासा’ के साथ-साथ ‘आर पार’, ‘चौदहवीं का चाँद’, ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’ और ‘बाज़’ जैसी फ़िल्में देखने को मिलेंगी। इन फिल्मों के 4K रीस्टोर्ड वर्ज़न तैयार किए गए हैं जिनका लुत्फ़ दर्शक ले सकते हैं। इस आयोजन का मक़सद नई पीढ़ी […] - [स्पेनिश फ़िल्म 'केंपीऑनेस' से कितनी अलग है सितारे ज़मीन पर : Sitare Zameen Par review](https://filmalay.com/sitare-zameen-par-review-in-hindi/): ‘सितारे ज़मीन पर’ फ़िल्म (Sitare Zameen Par review) जब ख़त्म होती है और उसके अंत में कहीं लिखा आता है कि यह स्पेनिश फ़िल्म ‘केम्पीऑनेस’ (Champions) की रीमेक है तो इच्छा हुई कि ‘अब पहले केम्पीओनेस’ भी देख ली जाए और फिर इस फ़िल्म पर कोई टिप्पणी की जाए। पता चला कि इससे पहले इस फ़िल्म का अरबी, जर्मन और हॉलीवुड सिनेमा में भी रीमेक बन चुका है।     स्पेनिश फ़िल्म के भारतीय संस्करण में मौलिकता कहाँ है?  ‘केम्पीऑनेस’ देखते हुए दिल उसी तरह टूटा जैसे तब, जब अनुराग बासु की ‘बर्फ़ी’ देखने के बाद पता चला था कि […] - [जानिए कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल 2023 की ऑफ़िशल सलेक्शन में शामिल फ़िल्में कौन सी हैं](https://filmalay.com/cannes-film-festival-2023/): छिहत्तरवें कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल (Cannes film festival 2023) के लिए फ़ेस्टिवल टीम ने अपने ऑफ़िशल सलेक्शन का ऐलान किया है। आइए जानते हैं फ़्रांस के शहर कान में होने वाले इस प्रतिष्ठित फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इस साल कौन कौन सी फ़िल्म शामिल हुई। कान ने अपने फ़ेस्टिवल लाइनअप में मार्टिन स्कोर्सीजी की “Killers of the Flower Moon और अलमदोवर की Strange Way of Life की घोषणा पहले ही कर दी थी। इसके अलावा जो फ़िल्में इस बार कान में शामिल होंगी उनकी घोषणा आज हो गई। फ़ेस्टिवल के लिए चुनी गई भारतीय फ़िल्मों में अनुराग कश्यप की केनेडी (Kennedy) फ़िल्म […] - [देश की राजधानी में नींद भी है एक सपना - Cities of sleep by Shaunak Sen](https://filmalay.com/cities-of-sleep/): सिटीज़ ऑफ़ स्लीप (Cities of sleep by Shaunak Sen) की समीक्षा दिल्ली में जिन सड़कों, फ़्लाइओवरों, से आप गुजरते हैं उनके आस-पास रात के वक्त ऐसे लोगों की दुनिया बस जाती जिनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना है – नींद. इसी नींद की सपनीली कहानी है शौनक सेन की सिटीज़ ऑफ़ स्लीप (Cities of sleep by Shaunak Sen). उस शहर में जहां रियल एस्टेट का बाज़ार अपने बूम पर हो, तीन कमरों और एक छत के लिए जहां लोग करोड़ रूपये तक खर्च कर देने की हैसियत रखते हों वहां एक बड़ी आबादी ऐसी भी है जो ज़िंदगी बस इस […] - [मानव कौल की फ़िल्म 'हंसा' : गांव में शहर की गुपचुप घुसपैठ](https://filmalay.com/hansa-manav-kaul/): हंसा, (Hansa by Manav Kaul) थियेटर और सिनेमा के अदाकार मानव कौल ने जब इस फिल्म को अपनी फेसबुक टाइमलाइन पे शेयर किया तो पता नहीं था कि इस लिंक के ज़रिये मैं उस दुनिया में पहुंचने वाला हूं जिसे मैने बचपनभर जिया है।   आइएमडीबी बताता है कि ये फिल्म 2012 में रिलीज़ हुई और इसे 8.3 की रेटिंग से भी नवाजता है। यूट्यूब पर शायद ये फिल्म ताज़ा ताज़ा अपलोड की गई है। मेरे लिये उत्तराखंड के परिवेश पर अब तक मानीखेज़ एक ही फिल्म थी- दांये या बांये। न जाने क्यों हंसा पर अब तक नज़र नहीं […] - [दस्तूरी समाज में कस्तूरी की तलाश : मसान](https://filmalay.com/masaan-movie-review/): फिल्म समीक्षा : मसान (masaan movie review) वो कहती है- “तुम बहुत सीधे और ईमानदार हो। बिल्कुल निदा फाज़ली की गज़लों की तरह।” वो पूछता है – “निदा फाजली, वो कौन हैं ?” और उसका एक मासूम सा जवाब-“यही तो तुम्हारी ईमानदारी है। “ ये स्वीकार्यता हर रिश्ते में नहीं होती। नायिका बशीर बद्र की फैन है। दुश्यंत कुमार की कविताओं की शौकीन है। और जानती है कि नायक ने अगर चकबस्त को सुन लिया तो वो बेहोश हो जाएगा। पर इस जानने में अहमन्यता नहीं है। जानने का कोई गुरुर नहीं है। वो जानती है नायक बुद्धू है पर […] - [राजस्थान में है शादी से पहले 'वर्जिनिटी टेस्ट' करने की ये कुप्रथा](https://filmalay.com/scared_glass_bowl-virginity-test/): सेक्रेड ग्लास बाउल प्रिया थुवत्सरी की डॉक्युमेंट्री फ़िल्म है जो राजस्थान में शादी से पहले 'वर्जिनिटी टेस्ट' (Virginity test ) की कुप्रथा के बारे में बताती है। - [‘ओल्ड स्कूल’ होकर भी ‘घणी बांवरी’ सी फिल्म - Tanu weds manu returns](https://filmalay.com/tanu_weds_manu_returns/): तनु वेड्स मनू रिटर्न ( Tanu weds manu returns) का प्रिमाइस रोचक है। एक शक्ल की दो लड़कियां हैं जिनमें एक ओरिजनल है एक डुब्लिेकेट। - [ये ‘निर्णय’ आखिर किसका है ?](https://filmalay.com/nirnay-documentary-film/): पुष्पा रावत कैमरा लेकर निकलती है निम्न मध्यवर्गीय परिवार की युवा लड़कियों की उन इच्छाओं की खोज में जिन्हें रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए उनके चेहरे, उनके व्यवहार में खोज पाना मुश्किल है। वो इच्छाएं या तो धीरे धीरे मर रही हैं या फिर उन पर थोप दी गई जिम्मेदारियों के मलवे में इतनी नीचे दबी हुई हैं कि कई बार ये इलहाम तक हो जाता है कि वो हैं भी या नही। उस कमरे में जिसकी दीवार का रंग एकदम फीका पड़ा हुआ है, जिसका आकार एकदम छोटा है, कुछ लड़कियां जिनमें शहरी आत्वविश्वास नहीं है, एक गाने पर […] - [Nh 10 Film यानी हत्याओं के प्रतिशोध से गुजरता हाइवे](https://filmalay.com/nh-10_movie/): एनएच 10 (Nh 10 Movie Review) के एक दृश्य में मीरा (अनुष्का शर्मा) हाइवे के किसी ढाबे के गंदे से टॉयलेट के दरवाज़े पर लिखे उस एक शब्द को मिटाती हैं- रंडी. हमारे समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता उसी गंदे टॉयलेट के सड़े-गले टीन के दरवाज़े की तरह ही है. एनएच 10 उस एक गीले कपड़े की तरह उस मानसिक गंदलेपन को पोंछने की एक अच्छी कोशिश करती है. फिल्म हाइवे पे तो निकलती है लेकिन ऐसी पगडंडियों को नमूदार करते हुए जिनके इर्द-गिर्द आज भी एक कट्टर मर्दवादी सामंती समाज रहता है. एक ऐसा समाज जहां बहन […] - [कसेट वाले ज़माने में मोह के धागे](https://filmalay.com/dam_laga_ke_haisha/): बाज़ार के सामने बार-बार हारता बॉलिवुड जब दम लगाता है तो दम लगाके हाइशा (dum laga ke haisha movie) सरीखा कुछ सम्भव हो पाता है। दम लगाके हाइशा खुद को हारते हुए देखकर भी जीतता हुआ महसूस करने सा अनुभव है। हमारी नज़र भर से जि़न्दगी के तमाम चेहरे एकदम बदल जाते हैं। जो चीज़ हमें जैसी लगती है ठीक वैसी वो कभी होती ही नहीं। हमारी अपनी सीमाएं उस चीज़ के हमारी जि़न्दगी में मायने बदल देती हैं। इसके असर कई बार दूसरों से और कई बार खुद से ही हमारे रिश्तों में नकारात्मकता भर देते हैं। इतनी नकारात्मकता […] - [पीके एकदम 'लुल'नहीं है](https://filmalay.com/pk_film_review/): चलिये शुरु से शुरु करते हैं। पीके (PK Film) इसी भाव से शुरु होती है। एकदम नग्न। आवरणहीन। इस विशाल दुनिया के मरुस्थल में एक नंगा आदमी खड़ा है जिसे दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता। ठीक उस मानसिक अवस्था में जैसे हम पैदा होने के ठीक बाद होते हैं। ठीक इसी बिन्दु पर फिल्म से बड़ी उम्मीदें बंध जाती हैं। एक एलियन की नज़र से इस दुनिया को देखना जिसके लिये ये दुनिया एक अनजान गोला भर है। वो नज़र जिसमें कोई पूर्वाग्रह नहीं है। जो किसी दुनियावी आडंबर को नहीं जानती। एक बच्चे की मासूम निगाहों से […] - [क्या इन्द्रधनुष एक सच है](https://filmalay.com/documentary-film-by-ritesh-sharma/): “ये“ लोग 2021 तक पूरे देश को हिन्दू बना देने की बात करते हैं। और सरहद पार से “वो“ लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान के बाद भारत में इस्लाम अपनी परवाज़ भरने लगे। ये पहचान के कुछ चैखटे हैं जिनमें कट्टरपंथी अपनी-अपनी मजबूरी के मुताबिक आपको और हमें फिट कर देना चाहते हैं। पहचानों की इस रणभूमि में जो ताकतवर है उसकी आवाज़ें अखबारों, समाचार पत्रों और यहां तक कि सोशियल मीडिया में सुखिर्यां बटोर लेती हैं। लेकिन उनका क्या जिनकी पहचान को हर धर्म तिरस्कार की नज़र से देखता है। वो पहचान जो न किसी धर्म के सांचे में […] - [Finding Fanny movie : अधूरी होकर भी मुकम्मल दुनिया](https://filmalay.com/finding_fanny/): फ़ाइन्डिंग फ़ैनी (Finding Fanny movie) इस स्वार्थी और व्यस्त होती जा रही दुनिया में एक ऐसी जगह की खोज की कहानी है जहां सबसे सबको मतलब होता है। या फिर ये कि स्वार्थी और व्यस्त जैसे बड़े और गम्भीर लफ्ज़ों से उपजने वाले भावों को किसी पुरानी जंग लगी कार में बिठाकर रोजी की उस उस मरी हुई बिल्ली के साथ दफना आने की कहानी है फ़ाइन्डिंग फ़ैनी। क्या है फ़ाइंडिंग फ़ैनी की कहानी रात के वक्त एक अकेले से घर में रह रहे फर्डी को एक खत आता है। खत देखकर फर्डी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगता है। उसकी पड़ौसी […] - [आँखें खोलने की नसीहत देती 'आँखों देखी' - Ankhon Dekhi review](https://filmalay.com/ankhon_dekhi/): आँखों देखी की समीक्षा (Ankhon Dekhi review) के पहले ही बता दूं कि अगर आप अच्छे सिनेमा के शौकीन हैं और आपने यह फ़िल्म नहीं देखी तो अब ज़रूर देख लीजिये। दो समानान्तर रेखाएं अनन्त पर मिलती हैं। बाउजी (संजय मिश्रा) इस बात को मानने से इनकार देते हैं। दो समानान्तर रेखाएं अगर मिल गई तो वो समानान्तर हो ही नहीं सकती। बाउजी के लिये ऐसा कोई अनन्त नहीं बना जहां हम-आप अपनी सुविधा के लिये दो समानान्तर रेखाओं को मिला देते हैं। दरअसल बाउजी उस गणित को अपनी दुनियां से बेदखल करने की ठान चुके हैं जो किसी और […] - [Beasts of the southern wild - उन चीज़ों को खोते देखना जो आपको बनाती हैं](https://filmalay.com/beasts-of-the-southern-wild/): Benh Zeitlin द्वारा निर्देशित, Beasts of the southern wild एक ऐसी बच्ची (Quvenzhane  Wallis ) की मार्मिक कहानी है जिसका ख़ुद पर और जीवन की अच्छाइयों पर पर बेइंतहा भरोसा है। समुद्र के किसी बिसराये हुए कोने में जहां छोड़ दी गई, बरबाद हो गई चीज़ें पड़ी हुई हैं वहां कुछ लोग हैं जो उस बिखराहट में अपना जीवन समेटे हुए हैं। उन्हीं में एक हैं विंक (Dwight Henry) की बेटी हशपपी। हशपपी 6 साल की बच्ची है जिसे अपनी मां का इन्तजार है। जिसे विंक ने बताया है उसकी मां कहीं गायब हो गई है। हशपपी उस झूठे इन्तज़ार […] - [A woman under influence : एक औरत के मन तक ले जाती फिल्म](https://filmalay.com/a-woman-under-influence/): Film : A woman under influence कितनी फ़िल्में होंगी जो स्त्रियों के मनोविज्ञान में बहुत गहरे तक झाँकने की कोशिश करती हैं। फ़िल्म जगत में ऐसी फ़िल्मों की स्थिति माइनोरिटी की तरह ही होगी। जाॅन कैसेवेट्स (John cassavetes) के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘अ वुमन अन्डर इन्फ़्लूएंस’ ऐसी ही फ़िल्मों में है जो रिश्ते, परिवार, अपने व्यवहार और यहांतक कि अपने वजूद के प्रति एक स्त्री की असुरक्षा, भय और इस वजह से पनपी मनोवैज्ञानिक अस्थिता को मानव स्वभाव की तहों तक जाकर समझने की कोशिश करती है। मेबल (Gena Rowlands) नाम की एक अधेड़ महिला के इर्द-गिर्द घूमने वाली […] - [अकेलापन समेटकर मुस्कराहट बिखेरती Amelie](https://filmalay.com/amelie_film_review/): एमिली (Amelie movie) अकेलेपन से जूझती एक लड़की है जो अपनी दुनिया को परी-कथाओं सा बनाकर अपने अकेलेपन का हल खोज रही है। एक सनकी से मां-बाप की लड़की जिन्हें लगता है कि उनकी बेटी को दिल की बीमारी है, इसलिये उसके बचपन भर में उसे घर से बाहर जाने की मनाही रही। यहां तक कि उसकी पढ़ाई भी घर मे ही हुई है। एक दुर्घटना में मां की मौत के बाद वो घर छोड़ देती है और एक कैफ़े में काम करना शुरु करती है। छोटी छोटी कल्पनाओं में बड़ी-बड़ी उड़ान लगाती एमिली (Power of Imagination in Amelie Movie) […] - [आपकी ज़िंदगी से बात करती एक फिल्म : Her Movie review](https://filmalay.com/her_film_review/): स्पाइक जोन्ज (Spike Jonze) निर्देशित फ़िल्म ‘हर’ (Her Movie review) आपको टूटे हुए रिश्तों से उपजे अकेलेपन, इन्तजार, विछोह जैसी भावनाओं के रास्ते उस खालीपन की तरफ ले जाती जिसे भरा जाना ज़रुरी सा लगने लगता है। थियोडोर (जैकिन फीनिक्स/ Joaquin Phoenix) एक लेखक है जो रिश्तों को जोड़ने के लिये लोगों की चिट्ठियां लिखता है। उसके शब्दों में रिश्तों की गहरी समझ है। लेकिन उसके अपने रिश्तों की दुनिया में एक असमंजस है जो उसे अपनी पुरानी प्रेमिका और पत्नी से तलाक की दहलीज़ पर ले आया है। तलाक के पेपर अभी साइन होने बांकी है। पर वो अब […] - [लड़के के लिए तबाह होती जिंदगियों का 'किस्सा' - Qissa movie review](https://filmalay.com/quissa-film-irfan-khan/): 1947 के भारत-पाकिस्तान के विभाजन के उस दौर में जब सिख अपनी रिहाइश के लिए जूझते हुए पाकिस्तान के पंजाब से भारत के पंजाब आ रहे थे, उनसे उनके पैतृक घर छूट रहे थे। उस दौर के भूगोल से अनूप सिंह एक ‘क़िस्सा‘ (Qissa movie review) ढूंढ़ कर लाते हैं। विस्थापित हो रहे सिखों में से एक अंबर सिंह अपने परिवार को लेकर एक नया घर बसाने निकल पड़ता है। कहानी वक्त में छलांगें लेती है। अब एक नया घर है, पत्नी है, दो बेटियां हैं, पर बेटा नहीं है। मर्द नहीं है जो एक पुरुषवादी समाज में परिवार को […] - [एक 'क्वीन'का आज़ाद होना - Queen movie review](https://filmalay.com/queen-film-review/): कंगना राणावत (Kangna Ranaut) अभिनीत फ़िल्म क्वीन (Queen movie review) दिल्ली से शुरू होती है। दिल्ली में कॉलेज आने जाने वाले लड़कों के बीच एक टर्म बहुत प्रचलित है। ‘बहन जी‘। ‘बहन जी टाइप‘ होना शहरी परिप्रेक्ष में एक लड़की के लिये अच्छा नहीं माना जाता। ‘यूथ‘ की भाषा में कहें तो ‘हैप‘ होना शहर के युवाओं की मुख्यधारा में आने के लिये एक ज़रुरी मानदंड है। इसके उलट परिवार और सगे सम्बन्धियों की परिभाषा में ‘बहन जी टाइप‘ लड़की एक आदर्श लड़की है। फिल्म क्वीन की कहानी में रानी की आयरनी शायद यही थी कि वो ‘हैप‘ नहीं थी। […] - [शुरुआत 'मासिक धर्म'की या गुलामी की - Salma Documentary film](https://filmalay.com/salma-documentary-film/): सलमा (Salma Documentary film) संयोगवश उस दिन देखी जिस दिन महिला दिवस का दिन भी था। रात के तकरीबन दस बज रहे थे। दिल्ली के जेएनयू के माही मांडवी छात्रावास के लॉन में अभी-अभी पत्रकार प्रेक्षिस नाम के समूह द्वारा रोहित जोशी के सम्पादन में निकाली गई पुस्तक उम्मीदों की निर्भयाएं का लोकार्पण हुआ था। ये पुस्तक 16 दिसम्बर को हुई बलात्कार की घटना के बाद बलात्कार और उससे जुड़े विषयों पर हुए विमर्शों पर छपे लेखों का एक ज़रुरी संकलन है। मौजूदा समय में महिलाओं पर हो रहे अपराधों और उनके विभिन्न पहलुओं को समझने के क्रम में हिन्दी […] - [Ship of theseus : पुर्जों से बने शरीर के अंदर कुछ और तलाशती एक फिल्म](https://filmalay.com/ship-of-theseus-film-review/): शिप ऑफ थीसियस फ़िल्म (Ship of theseus) देखी तो सोचा कि एक शहर के रुप में मुम्बई की आईरनी यही है कि उसकी बसावट में खुलेपन का अभाव है। पहली बार जब मैं मुम्बई आया था तो मुम्बई को देखकर गहरी निराशा हुई थी। एक शहर इतना बदसूरत कैसे दिख सकता है ? संकरी गलियों में किसी तरह आपस में चिपके हुए उखड़े पलस्तर वाले मकान। फ़िल्मों में देखे मुम्बई की माया टूट सी गई थी उस वक्त। पर यही कोई तीन साल बाद इस शहर में रहने के लिये आया तो इस शहर को दूसरी तरह से देखना शुरु […] - [कहीं आप भी नीरो के मेहमान तो नहीं हैं](https://filmalay.com/neros-guest/): रोम में एक शासक हुआ करता था- नीरो। एक ऐसा शासक जिसके शासनकाल में लगी आग की लपटें आज तक इतिहास के पन्नों को झुलसाती हैं। जब भी उन लपटों की बात होती है तो घोर जनता विरोधी शाषन की तस्वीरें उभरकर सामने आ जाती हैं, कुछ कुछ वही होता है जब भारत में पिछले सालों में हुई किसानों की आत्महत्याओं की बात होती है। किसानों की आत्महत्या पर बात करती दीपा भाटिया द्वारा निर्देशित डॉक्युमेंट्री फिल्म नीरोज़ गेस्ट (नीरो के मेहमान) एक ऐसी फिल्म जिसे देखकर न केवल गाँवों के लिये सरकारी रवैय्ये की पोल खुलती है बल्कि देश […] - [जल्द ही गाँव पर फिल्म बनाउंगा : दीपक डोबरियाल](https://filmalay.com/deepak-dobariyal-interview/):  मूलतः गाँव कनेक्शन के लिए लिए गए इस साक्षात्कार को यहां भी पढ़ा जा सकता है.  भारतीय सिनेमा में गाँव के किरदारों के बारे में जब भी बात होती है तो दीपक डोबरियाल का नाम ज़हन में ज़रुर आता है। ओमकारा, गुलाल, तनु वेड्स मनु, मकबूल, दांये या बांये से लेकर दबंग-2 जैसी फिल्मों में अपने गंवई अंदाज़ से दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाले दीपक डोबरियाल से बात की उमेश पंतने। पेश हैं इस बातचीत के कुछ अंश-  अपनी पैदाइश के बारे में कुछ बताईये? मेरी पैदाईश पौढ़ी गढ़वाल के कबरा गाँव में हुई। बचपन में चार-पांच […] - [आंखिरी लमहों में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल](https://filmalay.com/mumbai-film-festival-diary/): मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के छटे दिन फेसबुक पर फेस्टिवल के पेज से जानकारी मिली कि मुम्बई डाईमेन्शन कैटेगरी के अन्दर आने वाली 25 शॉर्ट फिल्म्स का प्रदर्शन एक बार फिर किया जा रहा है। मुम्बई डाईमेन्शन की पहली स्की्रनिंग छूट जाने का बहुत मलाल हुआ था। इसलिये इस स्क्रीनिंग को किसी भी हाल में न छोड़ने का मन बना लिया था। मैने फेसबुक पर पढ़ा था कि दिन के एक बजकर तीस मिनट पर फिल्म गोदरेज थियेटर में स्क्रीन होगी। पूरे फेस्टिवल का एक यही वैन्यू बचा था जिसमें हो रही स्क्रीनिंग में अब तक शामिल नहीं हुआ जा सका था। […] - [मुंबई फिल्म फेस्टिवल : पांचवा दिन](https://filmalay.com/mumbai-film-festival-day-five/):  पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई ट्रेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डॉट पेन से टिक करके सम्भावित अच्छी फिल्मों की लिस्ट बनाना, टिकट खिड़कियों से उस फिल्म का पास लेना, वक्त पर पहुंचने के लिये थियेटर की तरफ भागना और […] - [मुंबई फिल्म फेस्टिवल- चौथा दिन](https://filmalay.com/mumbai-film-festival-day-four/): एक और दिन मुम्बई फिल्म फेस्टिवल (Mumbai film festival) के नाम रहा। शुरुआत खराब थी। इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहौल में औडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गौडस हौर्सेज़ बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गई। स्क्रीनिंग हौल के बाहर दूर दूर से फिल्म देखने आने वाले लोग इन्तज़ार करते रहे पर वहां उन्हें बताने वाला भी कोई नहीं था कि फिल्म किस वजह से ऐसे अचानक टाल दी गई है। 60-62 साल की एक बुजुर्ग महिला जो उससे पहले दिन भी फिल्म देखने आई थी, निराश थी। कह रही […] - [मुम्बई फिल्म फेस्टिवल- दूसरा और तीसरा दिन](https://filmalay.com/mami-second-day/): सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुम्बर्इ फिल्म फेसिटवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थियेटर की कुर्सियों पर टिककर फिल्मी अनुभवों को अपनी जि़न्दगी का हिस्सा बनाया जाएगा। पर रात को देर से सोने की आदत सुबह देर से उठने की मजबूरी पैदा कर ही देती है। ऐसे हुई दिन की शुरुआत खैर उठते ही फटाफट नहा धोकर कदम स्टेशन की ओर बढ़ाए जा चुके थे। टेन से सीएसटी पहुंचा जा चुका था। फिर सीएसटी से […] - [Mumbai film festival Diary-1 : फिर आया मुंबई फिल्म फेस्टिवल](https://filmalay.com/mami-diary-1/): Mumbai Film festival नाम से एक जलसा मुम्बई में दस्तक देने वाला है। इस जलसे की उत्सवधर्मिता का स्वरूप बिल्कुल अलहदा है। इस जलसे में जो होगा, वो स्क्रीन पर होगा और उसका असर लोगों के दिलो-दिमाग और शायद मानसिकताओं पर होगा। सिनेमा को पालते पोसते इस शहर में सिनेमा के इस उत्सव को लेकर कितना उत्साह है, ये कल से पूरे एक हफ्ते देखने को मिलेगा। मामी मुम्बई के रास्ते पर है। बस आज यह हम तक पहुंच जाएगा। इस बार मिस नहीं करना है। मन बना लिया है। पिछली बार अंधेरी में रहते हुए भी, वाकिंग डिस्टेंस पर […] - [Barfi movie - बर्फी के साथ- 'चल भटक ले ना बांवरे'](https://filmalay.com/barfi-movie-review/): बर्फी (Barfi Movie review) एक कविता सी फ़िल्म है जो परदे से गुजरती आपके दिल में घट जाती है। आपके जीवन में जब कविताएं घट रही होती हैं, जिन्हें महसूसने के लिये आपको शब्दों के सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ती, जब दिखाई देता हुआ और सुनाई देता हुआ भी अर्थहीन हो जाता है, कुछ बेवजह सा, बेनाम सा होता है जो दिल पे गहरी छाप छोड़ जाता है, जैसे ताजे ताजे फाहों वाली बर्फ गिर रही हो, जैसे हौले हौले से बारिश हो रही हो, जैसे नीले आसमान में बादल कोई टुकड़ा खामोशी से रैंग रहा हो, जैसे आप इन […] - [एक ईमानदारी से बोले गये झूठ की 'कहानी'](https://filmalay.com/kahani-film-review/): कहानी के ट्रेलर देखकर लग रहा था कि कोई रोने धोने वाली फिल्म होगी… जिसमें शायद कलकत्ते को लेकर नौस्टेल्जिया जैसा कुछ होगा… शायद एक पीडि़त प्रेग्नेंट औरत होगी जो अपने अधिकारों के लिये लड़ रही होगी… शायद नो वन किल्ड जैसिका जैसा ही कुछ… पर फिल्म देखने के बाद अच्छा लगा कि कुछ नया देखने को मिला… प्रिडिक्टिबिलिटी से परे… बौलिवुड के मौजूदा परिदृश्य में जिस तरह फिल्मों से बासीपन की बू आ रही थी, उसके बीच एक ताजी हवा सी लगी ये कहानीं कहानी को देखते हुए हर वक्त आगे क्या होगा वाली भावनाएं ज़ेहन में बनी रही। […] - [हमारे सिनेमा को जरुरत है पान सिंह तोमर जैसे बागियों की](https://filmalay.com/pan-singh-tomar-movie-review/): बीहड़ में बागी होते हैं… डकैत मिलते हैं पार्लामेन्ट में….  पान सिंह तोमर का ये डायलौग फेसबुक की दीवारों पे बहुत दिनों से छाया हुआ था…. तिग्मांशू धूलिया की हासिल देखने के बाद उनकी इस फिल्म से उम्मीदें महीनों पहले से बांध ली थी… आज पवई आईआईटी के पड़ौसी बिग सिनेमा के थियेटर में फिल्म देखने के बाद लगा जैसे कोई साध पूरी हो गई।  एक बागी के लिये इतना सम्मान, और अपने सिनेमा के लिये इतना प्यार, इतना दुलार, बड़े अरसे बाद आया… फिल्म शुरु होने से ठीक पहले परदे पर कुछ बच्चों के इशारों से देश के सम्मान के प्रतीक […] - [पति-पत्नी के रिश्ते के बनने और बिगड़ने की कहानी -](https://filmalay.com/blue-valentine-film-review/): “You got to be careful that person you fall in love is worth it to you” “How can you trust your feelings when they can disappear like that..” किसी से प्यार करते वक्त जो बात सबसे ज़रूरी है वो ये कि इस बात का पूरा ध्यान रखा जाये कि जिससे आपको प्यार हो रहा है वो इस लायक है भी कि नहीं कि उसे प्यार किया जा सके। ये बात भले ही थोड़ा अटपटी लगे लेकिन ब्लू वैलेन्टाइन यही बात व्यावहारिक ढ़ंग से समझाती है. अक्सर हम अपनी भावनाओं के वश में आकर प्यार करते हैं.  भावनाओं का भरोसा करते […] - [नादान परिंदे घर आजा.....](https://filmalay.com/rock-star-film-review/): कुछ दिन पहले भवन्स कौलेज में रौकस्टार के प्रोमोशन का लाईव शो देखते हुए कई सारे टैक्निकल एरर हुए तो कुछ शक सा हुआ। स्टेज के दोनों ओर दो एलिवेटर लगे थे जिन्हें नर्गिस फखरी और रणबीर कपूर को उनके परफोर्मेंस के बाद नीचे वापस पहुचाना था। रणबीर तो वापस पहुंच गये लेकिन नर्गिस का एलिवेटर गच्चा दे गया। फिर रहमान के गाते वक्त पियानो खराब हो गया तो उन्हें अपना गाना स्किप करना पड़ा। वहां दोनों ओर लगी स्क्रीन्स पर जो प्रोमो दिखे उनमें नर्गिस की खराब एक्टिंग का अक्स दिख चुका था। पर साडडा हक एथ्थे रख का […] - [दांये या बांये देखने के बाद](https://filmalay.com/danye-ya-banye-film-review/): यहां मुम्बई में बैठे दायें या बायें देखते हुए एक कार थी जो पहाड़ के एक गांव कांडा के कलाकेन्द्र तक छोड़ आई। ये पूरा सफर बहुत ही आत्मीय था। चीजें जब आम्मीय होती हैं तो हम उनकी खामियों को अनदेखा कर देते हैं। बेला नेगी की दांयें या बांये देखने के बाद अनदेखियां करने का मन होता है। एक समय था जब अपनी मां के साथ बागेश्वर के पास के उस कांडा गांव में जाना होता था। मैं थक जाता था। वो नहीं थकती थी। मां कहती थी कि बस बेटा अब थोड़ा और चलना है। और उस थोड़ा […] - [ब्लू वेल्वेट- माने मखमल के उस पार](https://filmalay.com/blue-velvet/): एक उनींदी सी रात के दो बजे जब तय हो गया कि आज नींद नहीं ही आयेगी तो अपने फ़िल्मों के कलेक्शन पे गौर किया। रात काटने का ये एक बेहतरीन विकल्प मालूम हुआ। ब्लू वेल्वेट (Blue Velvet Movie)। डेविड लिंच (David Linch) की ये फ़िल्म किसी तरह छूट गई थी। सोचा देखी जाये। देखने के बाद लगा कि इसे देखने का इससे बेहतर वक्त शायद कोई और नहीं हो सकता था।   एक विचित्र सा साइकॉटिक संसार अगर आपने अल्फ्रेड हिचकौक (Alfred Hitchcock) की फ़िल्म साईको (Phycho) देखी हो और आपको उस जौनर की फ़िल्में पसंद हों तो तो […] - [एक बैली डांसर के मानसिक फ़ितूर की कहानी - Black swan movie](https://filmalay.com/black-swan/): हमारा अपना काल्पनिक मानसिक संसार जब हमारी जिन्दगी में शामिल होने लगता है तो हमारा व्यवहार उसे ज़ाहिर कर देता है। इस रियल और इमेजनरी मेंटल वर्ड का मिक्सचर सिनेमा के जरिये कभी कभी एक जबरदस्त अनुभव बन जाता है। फ़िल्म देखते हुए तो आप फ़िल्म के साथ जीने ही लगते हैं फ़िल्म देखने के बाद भी आप कुछ देर उस दुनिया से बाहर नहीं निकलना चाहते। उस दुनिया में क्या, क्यों और कैसे हो रहा था आपको इन सवालों से उपजी उलझनें अपने में कहीं शामिल कर लेती हैं। आप उन उलझनों का हिस्सा हो जाते हैं। और खुद […] - [ये साली.... अच्छी थी](https://filmalay.com/ye-sali-zindagi-movie-review/): इन्टयूशन था कि साली अच्छी होगी। कई इन्टयूशन सच निकलते हैं। इस बार यही हुआ। ये साली जिन्दगी कुलमिलाकर एक अच्छी भली फिल्म थी। इसे देखते हुए ऐसा नहीं लगा कि कुछ रेगुलर देख रहे हैं। गन थी। धांय धांय थी। गेंग्स्टर्स थे। पर अभी रामू मार्का किसी डाईरेक्टर की जगह सुधीर मिश्रा थे। इसीलिये फिल्म थोड़ी अलग बन पड़ी। थोड़ी स्टाईलाईज्ड सी। अच्छी एडिटिंग निहायत रफ और रा कहे जा सकने वाले कैची डायलौग्स, इरफॅान की आम आदमी वाली खास आवाज में नेरेशन और कई परतों में बुना हुआ लेयर्ड सा नेरेटिव स्टाईल। ये सारी बातें फिल्म को आमतौर […] - [रेत और रोमान पोलान्सकी - Roman Polanski films](https://filmalay.com/roman-polanski-films/): बीते साल की आख़िरी सांसों के इर्द गिर्द महज महीना पुरानी बेरोजगारी की एक हल्की सी बू थी। रिज़्यूमे को ईमेल के जरिये किसी किसी के इनबॉक्स में धकेलने की प्रक्रिया थी। ख़ालीपन का एक सतही अहसास था। फिर दिल्ली से मुम्बई पहुँच जाने का फैसला था। नई उम्मीदों और सचमुच का समंदर था। लहरें थी। वर्सोवा था। रोज शाम लाल सूरज का क्षितिज से नीचे उतरता एक असल दृश्य था और समुद्र में पहले सुनहरा और फिर समुद्र के रंग का होता लहरों में कहीं डूब जाता आभासी सूरज था।   वो बेरोज़गारी के दिन और वर्सोवा दिन बीत […] - [सिने सफर मुख्तसर -भाग 2](https://filmalay.com/bahastalab-on-cinema-part-2/): बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अविनाश ने खुद कुछ कहने के बाद वरुण ग्रोवर को दे दी। वरुण ग्रोवर  ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त प्रयोग हो रहे हैं। फिल्म की पब्लिसिटी के लिये फिल्म की हिरोईन मसलन मनीसा काईराला के मर्डर की अफवाह तक फैलाने […] - [सिने सफर मुख्तसर -भाग 2](https://filmalay.com/bahastalab-on-cinema/): बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अविनाश ने खुद कुछ कहने के बाद वरुण ग्रोवर को दे दी। वरुण ग्रोवर वरुण ग्रोवर  ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त प्रयोग हो रहे हैं। फिल्म की पब्लिसिटी के लिये फिल्म की हिरोईन मसलन मनीसा काईराला के मर्डर की अफवाह […] - [सिनेमा पर दिग्गजों ने रखी अपनी बात](https://filmalay.com/film-discussion-by-film-stars/): मोहल्ला लाईव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स द्वारा आयोजित बहसतलब का पहला दिन कुछ सार्थक बहसों के नाम रहा । अविनाश दास ने कार्यक्रम की रुपरेखा रखी और फिर मिहिर पान्डया के संचालन में कार्यक्रम ने रफतार पकड़नी शुरु की। अभी गाड़ी स्लो पेस में थी। सफर शुरु हुआ ही था। सिनेजगत की उपरी सतहों से शुरु होकर उसकी गहराईयों में उतरता एक बातचीत का सफर जिसमें एक साथ परदे के पीछे अपनी भूमिका अदा करने वाले निर्देशक भी थे, परदे के दूसरी ओर उनकी फिल्मों में अपनी जिन्दगी का अक्स तलाशते दर्शक भी थे और परदे पर उस पूरे सिने […] - [पावन पत्नियों का कलुषित सच](https://filmalay.com/the-holy-wives-film-by-rites-sharma/): हाल ही में रितेश शर्मा की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म दिल्ली में प्रदर्शित की गई जिसमें देवदासी प्रथा जैसी ऐसी कुरीति पर सवाल उठाये गये जिसपर मेनस्ट्रीम मीडिया में आजकल मुश्किल से कोई बहस हो रही है। द होली वाईव्स नाम से बनी यह फिल्म बताती है किस तरह इस दौर में महिला अधिकारों को लेकर हल्ला मचाया गया, घरेलूं हिंसा विरोध्ाी कानून बने और महिला अधिकारों पर कई बहसें हुई लेकिन इसके बावजूद कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई इलाके ऐसे हैं जहां इन कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रहीं हैं वो भी धर्म के नाम पर और पूरी […] - [जीविका से जुड़ी आम आदमी की फिल्में](https://filmalay.com/jeevika-film-festival/): वृत्त्चित्रों को लेकर भारत में अपेक्षाकृत ठीक ठाक काम होता है लेकिन उनके प्रदर्शन को लेकर उतने प्रयास नहीं दिखाई देते। शहरी इलाकों में कभी कभार कुछ फिल्म फेस्टिवल्स को छोड़ दें तो इनके प्रदर्शन के लिये कोई सुचारु व्यवस्था हमारे देश में देखने को नहीं मिलती। शायद यही वजह है कि कई गम्भीर मुद्दे इन फिल्मों की शक्ल में उठते तो हैं पर दर्शकों के अभाव में अपनी मौत मर जाते हैं और ये फिल्में चंद फिल्म शोधार्थियों, छात्रों और खुद फिल्मकारों तक सीमित रह जाती हैं। इस बीच दिल्ली के हैबिटेड सेंटर में 27 से 29 अगस्त को […] - [आज़ादी की तलाश में जीवन से आगे की खोज - Into the wild movie](https://filmalay.com/into-the-wild/): Into the wild movie एक अनोखी यात्रा की कहानी है। एक दिन वो सब कुछ छोड़ कर चला जाता है। अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री जहाँ उसने टॉप किया, अपने लाखों रुपये जो उसने अब तक भविष्य के लिए बचाये थे, अपने परिवार के लोग, सबकुछ छोड़कर वो चला जाता है कहीं दूर अलास्का के जंगलों की तरफ। अपने मां बाप और बहन को छोड़कर। बिना कुछ बताये। क्यों? इसके लिये उसके पास कई कारण हैं। वो अपने मां बाप को बचपन से देख रहा है छोटी छोटी बातों पर लड़ते हुए। वो देखता आया है उनकी बहसों के कारण कितने […] - [अकीरा कुरुसावा की ड्रीम सीरीज़ की फ़िल्में - Akira Kurosawa dreams](https://filmalay.com/kurosawa-films/): अकीरा कुरुसावा की ड्रीम्स (Akira Kurusiwa dreams) सीरीज़ एक लोकप्रिय फ़िल्म सीरीज़ है। कई बार हम सपने देखते हैं और जब जागते हैं तो सोचते हैं जो हमने देखा उसका अर्थ आख़िर था क्या। पर अक्सर ज्यादातर सपनों को हम भुला ही देते हैं ऐसे जैसे उन्हें हमने कभी देखा ही न हो। पर क्या आपको नहीं लगता कि किसी दूसरे के सपने अपनी आंखों से देखना कितना रोमांचक अनुभव हो सकता है। और वो भी तब जब सपने किसी सुन्दर फिल्म में फिल्मा लिये गये हो और वो भी अकिरा कुरुसावा जैसे निर्देशक के द्वारा। कुरुसावा की फिल्म ड्रीम्स […] - [लव, सेक्स, धोखा और धोखा फ़िल्म](https://filmalay.com/love-sex-aur-dhokha-review/): लव, सेक्स और धोखा (Love sex aur dhokha movie)। इन तीनों में से कोई भी शब्द हाईपोथैटिकल और नया नहीं है। तीनों इन्सानी फितरत के हिस्से हैं। और इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भी। लेकिन दिबाकर बनर्जी जिस तरीके से इन तीनों को स्क्रीन पे दिखाते हैं उससे फिल्म की ग्रामर को ही एक नई धारा सी मिल जाती है। मेरी समझ से इस तरह की फिल्म हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं बनी। जिसमें सब कुछ आन कैमरा चल रहा है। फिल्म कैमरे के पाईंट आफ व्यू से हमें तीन अलग अलग कहानियां दिखाती है। लेकिन जिस तरह से इन […] - [भूत के प्रकोप से मुक्ति की सच्ची कहानी](https://filmalay.com/eyes_of_stone_film_by_nilia_vachani/): निलिता वचानी एक जानी मानी डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर हैं ये बात कल उनकी फिल्मों के अंश देखते और उन पर उन्हीं की टिप्पणियों को सुनते मालूम हुई। ‘आइज आफ स्टोन’ उनकी उल्लेखनीय वृत्तचित्रों में शुमार है। साथ ही सब्जी मंडी के हीरे भी चर्चा में रही है। वृत्तचित्रों के लिए एक खास किस्म की समझ होना बड़ा लाजमी है क्योंकि ये समझ उसे एक सादा डाक्यूमेंटेशन बनने से रोकती है। डाक्यूमेंट्री का फ़ॉर्म सादी बाईट और इवेन्ट के बेहद सरल डाक्यूमेंटेशन से इतर भी बहुत कुछ हो सकता है निलिता की फिल्में ये बात बड़ी आसानी से समझा देती हैं। […] - [लाशों से कफन बीनने वालों पर बनी फिल्म को नैशनल अवार्ड](https://filmalay.com/national_award_for_chindren_of_pyre/): जामिया के मासकम्यूनिकेशन रिसर्च सेन्टर में साउन्ड के लेक्चरार मतीन अहमद को फिल्म चिल्ड्रन आफ पायर की साउन्ड डिजाइनिंग के लिये इस बार का नैशनल अवार्ड दिया जा रहा है।  बनारस में मरघटों पर जलती हुई लाशों से कफन बीनने वाले बच्चों की कहानी ये फिल्म वाराणसी के उन 6 बच्चों की कहानी है जो मरघटों पर जलती हुई लाशों पर लिपटे हुए कफन बीनते हैं। कफन बीनकर या कभी कभी चुरा और छीनकर अपनी जिन्दगी जीने वाले इन बच्चों का जीवन कैसे बसर होता है चिल्ड्रन आफ पायर इसे मार्मिक तरीके से दिखाती है। ये वो बच्चे हैं जो […] - [एक बेजुबान आक्रोश - Aakrosh film review](https://filmalay.com/akrosh-film-review/): सारे आक्रोश (Aakrosh film review) महज एक दुर्घटना बनकर समाप्त हो जाते हैं। ये आक्रोश भी कुछ ऐसा ही था। गोविन्द निहिलानी की इस फ़िल्म को देखकर ताजा ताजा बस यही समझ में आता है कि आक्रोश की अपनी असल आवाज उसके सन्नाटे में दबी होती है। मगर अक्सर इस चुप्पी के पीछे जो आक्रोश दबा होता है वो इतना खामोश रहता है कि उसका होना न होना बनकर समाप्त हो जाता है। आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार पर बनी इस पूरी फ़िल्म में सन्नाटा एक तकनीक की तरह प्रयोग हुआ है। क्या है आक्रोश फ़िल्म की कहानी (Aakrosh film […] - [एक बवंडर से उठी फिल्म - Bawandar Movie review](https://filmalay.com/bavandar-film-review/): राजस्थान के भंवरी देवी केस (Bhanwari Devi case) को शायद आप अब तक न भूले हों। 1992 में राजस्थान की भतेरी गाँव की इस महिला का गाँव के ही कुछ उच्च जाति के लोगों ने बलात्कार किया। वजह यह थी कि एक छोटी जाति की महिला होने के बावजूद उसने गाँव में हो रहे बाल विवाह को रोकने के लिए सरकार की मदद करनी चाही। केन्द्र सरकार के महिला विकास कार्यक्रम के तहत साथिन नाम की संस्था के साथ उसने सक्रिय रुप से गाँव की सामाजिक बुराईयों के उन्मूलन का बीड़ा उठाया। जिसका खामियाजा उसे अपनी आबरु लुटाकर उठाना पड़ा। […] - [डेज़ आफ हैवन यानि खूबसूरती के पल - Days of heaven film review](https://filmalay.com/days-of-heaven-film-review/): डेज़ ऑफ़ हैवन ( Days of heaven film) उन कमाल की फिल्मों से एक है जिन्हें आप चाहें तो बस उनकी सिनेमेटोग्रेफी के लिए देख सकते हैं। फ़िल्म का हर दूसरा फ्रेम आपको मजबूर कर देता है कि फिल्म को रोककर बस उस फ्रेम में डूब जाया जाये। उसी तरह जैसे पहाड़ों में सर्दियों के मौसम में घूमने निकले हों। और कंपाती ठंड के बीच जहां जहां धूप दिखे वहां वहां रुक जाने का मन हो। इसलिये नही कि ठंड है। इसलिये कि वो धूप गजब प्यारी है।   शिकागो का एक प्रेमी युगल की कहानी (Days of heaven film, […] - [लगत जोबनवा मा चोट को खोजती एक फिल्म](https://filmalay.com/documentary-by-saba-diwan/): लगत जोबनुवा में चोट, फूल गेंदवा न मार। ये शब्द फिर गाये नहीं गये। ठुमरी के ये बोल कहीं खो गये होते।शब्द ही थे। खो जाते। अगर सबा उन्हें ढ़ूढ़ने की कोशिश नहीं करती। लेकिन सबा दीवान को न जाने क्या सूझी कि वो इन शब्दों को ढ़ूढ़ते ढूंढ़ते एक सिनेमाई सफर तय कर आई। उनकी डोक्यूमेंटी फिल्म द अदर सौंग दरअसल लगत जोबनुआ में चोट के लगत करेजवा में चोट बन जाने की यात्रा है। आंखिर क्यों जोबनुआ करेजवा हो गया। शब्दों को इस तरह बदल देने के पीछे आंखिर क्या वजह रही होगी। इन्हीं प्रश्नों को तलाशती सबा […] - [युद्व के उन्माद और क्रूरता की भयावह कहानी है सोल्जर ब्लू - Soldier Blue Movie review](https://filmalay.com/soilders-blue-film-review/): युद्व का उन्माद कितना विभत्स, कितना भयावह और अमानवीय हो सकता है यह Ralph Nelson निर्देशित फ़िल्म सोल्जर ब्लू (Soldier Blue Movie) में देखा जा सकता है। ये एक अमेरिकी फ़िल्म है। इतिहास में झाँकती, जंग के मैदान में ले जाती और उस मनःस्थिति से रुबरु कराती जो एक आदमी को निहायत जंगली बना देने पर उतारु कर देती है। जो एक सभ्यता के असभ्य हो जाने की अन्तिम सीमा तक पहुंचने की यात्रा दिखाती है। फलतः आदमी के अमानवीय हो जाने की दर्दनाक सच्चाई को खुलकर अपने नग्न रुप में हम तक पहुंचाती है और कुछ सवाल छोड़ जाती […] - [खरगोश ओसियान में अव्वल](https://filmalay.com/khargosh-film-review/): सोने जा ही रहा था कि एक सूचना मिली। सूचना बड़ी अच्दी लगी तो सोचा आपको बता ही डालूं। खरगोश को ओसियान के दर्शकों ने सबसे ज्यादा पसंद किया। ये तो पता ही था। लेकिन बात और साफ हो गई जब ओसियान के पुरस्कारों की घोषणा की गई। औडियन्स पोल कैटेगरी में खरगोश ने बाजी मार ली। लौंग नाइट को बेस्ट फिल्म का ज्यूरी अवार्ड दिया गया। हातेम अली निर्देशित यह सीरियन फिल्म जेल में डाल दिये गये राजनैतिक व्यक्ति की कहानी है। ज्यूरी ने कहा कि ये दोनों ही फिल्में यथार्थ और कल्पना का एक गजब मेल करती हैं […] - [कौन हैं सुपरमैन ऑफ़ मालेगाँव जिनपर बन गई डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म- Superman of Malegaon review](https://filmalay.com/super_man_0f_malegaon/): वे फ़ैज़ नहीं हैं फ़ैज़ा हैं इसलिए उनका अंदाज़े-बयाँ अलहदा है। फ़ैज़ शब्दों से अपनी बात कहते थे फ़ैज़ा ( Faiza Ahmad Khan) ने वृत्तचित्र सुपरमैन ऑफ़ (superman of malegaon) के ज़रिए कही और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई, चित्रों के कई वृत्त सी बनाती, जैसे नदी के शान्त प्रवाह में कंकड़ को हल्के से धकेल दिया हो। फ़ैज़ा अहमद ख़ान और कुहू तनवीर की फ़िल्म सुपरमैन आफ मालेगाँव एक डॉक्यूमेंट्री फ़ॉर्म की फ़िल्म है। पूरी फ़िल्म एक फ़िल्म बनने की प्रक्रिया से जुड़ती है और फ़िल्म के भीतर उस फ़िल्म के बन जाने […] - [ओसियान का दूसरा दिन](https://filmalay.com/osian-film-festival/): ओसियान फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन आज तीन फिल्में देखी। तेजा, मैन वूमेन एंड अदर स्टोरीज और ब्लाईंड पिग हू वान्टस टू फलाई। हेला जर्मिया के निर्देशन में बनी ‘तेजा’  पहली फिल्म तेजा हेला जर्मिया के निर्देशन में बनी है। फिल्म अफ्रिका के इन्टलेक्चुअल युवाओं के पलायन पर केन्द्रित है। फिल्म मुख्य रुप से अपने अतीत पर अधिकार के हक के समर्थन में खड़ी होती है। अफ्रिकी समाज की एक बहुत कड़वी सच्चाई को दिखाती इस फिल्म के कुछ अंशों में दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक अफ्रिकी डोक्टर एन्बर्बर जो अपने देश, समाज और अपने व्यवसाय के […] - [मैन विद मूवी कैमरा : कैमरा जब आंख बन जाता है](https://filmalay.com/man-with-movie-camera/): फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए मैन विद मूवी कैमरा एक कमाल की फिल्म है। जिस दौर में सिनेमा की शुरुआत होती है उस दौर में कैसे एक डाइरैक्ट हर सम्भव तकनीक अपनी फिल्म में प्रयोग कर लेता है और पूरी सफलता से, ये बात फिल्म देख लेने के बाद ही पता चलती है। 1929 में बनी ये डौक्यूमेंट्री फिल्म रसियन निर्देशक वर्तोव ने निर्देशित की। न फिल्म में कोई कहानी है, ना ही कोई निर्धारित पात्र साथ ही यह एक मूक फिल्म है। लेकिन एक घंटे से कुछ ज्यादा समय में आपको एक फिल्म को तकनीक के […] - [साहित्यकारों को आईना दिखाती फ़िल्म - Party Movie review](https://filmalay.com/party-film-review/): पार्टी कल्चर से बहुत ज्यादा ताल्लुक ना होने के बावजूद इस पार्टी (Party Movie) ने लुभा लिया। 1984 में आई गोविन्द निहिलानी की फ़िल्म पार्टी गर्मियों की पहाड़ी ठंडक का अहसास करते हुए देखी। फ़िल्म वर्तमान साहित्य जगत के पूरे गड़बड़झाले को उस दौर में भले ही कह गई हो पर आज भी सीन बाई सीन सच्चाई वही है। तल्ख़ ही सही। क्या है फ़िल्म पार्टी की कहानी (Story of Party Movie) पार्टी की कहानी एक पार्टी की तैयारियों से शुरु होती है। ये पार्टी प्रतिष्ठित साहित्यकारों की है जो एक साहित्यकार बरवे जी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिये जाने पर […] - [ये रही ईरानी निर्देशक माजिद मजीदी की दो कमाल की फिल्में](https://filmalay.com/majid-majidi-movies/): इस बीच माजिद माजिदी की दो फिल्में (Majid majidi movies) देखने को मिली। चिल्ड्रन आफ हैवन और कलर्स आफ पैराडाईस। माजिद माजिदी की फिल्में एक अलग संसार रचती हैं। गांवों का संसार, भावनाओं का संसार और अदभुत प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक सुन्दरता का संसार। इन दो ही फिल्मों ने इस ईरानी निर्देशक के प्रति एक अजीब सा आकर्षण जेहन में पैदा किया है। कोई निर्देशक कितनी गहराई से अभावों के बीच से उपजते मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को समझ सकता है, और बेहतर तरीके से समझा सकता है ये माजिद की फिल्मों को देखकर समझा जा सकता है। मानवीय सम्बन्धों और भावनाओं की […] ## Pages - [Terms](https://filmalay.com/terms/): Last updated: (04/10/2023) Please read these Terms and Conditions (“Terms”, “Terms and Conditions”) carefully before using the http://www.filmalay.com website. 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