पायर – पलायन की चिता में जलते पहाड़ों में झांकने की खिड़की

Pyre movie review

Last Updated on: 2nd November 2026, 07:18 am

बहुत पहले मुंबई फ़िल्म फेस्टिवल में एक फ़्रांसीसी फ़िल्म देखी थी ‘अमौर’। मशहूर निर्देशक माइकल हानेका (michael haneke) की यह फ़िल्म पेरिस के अपने फ़्लैट में रह रहे दो बुज़ुर्गों के आपसी प्रेम, अकेलेपन की पीड़ा और स्ट्रोक जैसी बीमारी से जूझने के बीच एक दूसरे के प्रति समर्पण की कहानी है. जहाँ अकेलेपन, उम्र और अपाहिज बना देने वाली बीमारी से उपजी बेबसी ऐसी है कि आत्महत्या और यहां तक कि अपने प्रियतम को दुख से आज़ाद करने के लिए उसकी जान ले लेने का विचार एक सहज विचार की तरह लगने लगता है.

विनोद कापड़ी की फ़िल्म ‘पायर’ (Pyre movie by Vinod Kapri) देखते हुए मुझे पदम (पदम सिंह कापड़ी) और तुलसी (हीरा देवी) के किरदार में ‘अमौर’ के जॉर्ज और ऐन रह-रह कर दिखाई देने लगे थे. मैं सोच रहा था कि मानवीय भावनाओं की यह क्या ही ग़ज़ब बात है कि परिवेश, भाषा, भूगोल की इतनी भिन्नताओं के बावजूद हमारी ख़ुशियाँ, दुख, दर्द सबकुछ कितना समान दिखाई देता है. 

फ़िल्म शुरू ही ऐसे होती है कि एक उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ की चोटी पर किसी रिज पर चलता एक अस्सी साल का बुजुर्ग (पदम सिंह) अपनी पिछत्तर साल की पत्नी (हीरा देवी) को आँख बंद करने को कहता है. चलते-चलते एक गहरी खाई के ठीक ऊपर एकदम कोने पर पहुंचकर वो बोलता है -“जैसा मैं कहूँगा वैसा करेगी?”

पायर फ़िल्म (Pyre movie) इसी आत्महंता विचार को एक झूठी उम्मीद में बार-बार हराते हुए एक बुजुर्गवार द्वारा किए जा रहे संघर्ष की दर्द भरी कहानी कहती है. ऐसा दर्द जो जीवन को जीते-जागते एक अकेलेपन की ऐसी चिता में बदल देता है जहाँ मौत से पहले बची रह गई उम्र लगातार जलते-जलते कटी जा रही है।  

 

Pyre movie और अकेलेपन की चिता

‘पायर’ यानी चिता दरअसल अपने इकलौते बेटे के कभी न ख़त्म होने वाले इंतज़ार के बीच उसके आने की उम्मीद लगाए, अकेलेपन से जूझते दो पहाड़ी बुजुर्गों की कहानी है जो कई बार मशहूर लघु कथा लेखक गाय दी मोपासा की कहानी ‘माई अंकल जूल्स’ की भी याद दिलाती है.

फ़िल्म में पदम सिंह और हीरा देवी, मोपासा की इस कहानी की तरह उस झूठी उम्मीद में जी रहे हैं जिसे सच मानकर पाले गए वहम में जीने के सिवा और कोई चारा भी नहीं है। 

उत्तराखंड के बेरीनाग के एक दुरूह गाँव में रह रहे ऐसे ही बुर्जुग पदम और तुलसी की इस कहानी में उनके आपसी प्यार, नोक-झोक, मन-मुटाव और दुष्कर जीवन के संघर्षों के बीच उनका पुत्रमोह और उससे उपजी उम्मीद और निराशा का टकराव एक दर्शक के तौर पर मन में जो टीस पैदा करता है वह फ़िल्म देखने के बहुत बाद तक बनी रह जाती है. 

विनोद कापड़ी की फ़िल्म के ‘हरिया’ और मोपासा की कहानी के ‘अंकल जूल्स’ के लौटने की उम्मीद कई मायनों में एकदम समान भाव पैदा करती है. क्या वो कभी लौटेंगे? इसी उम्मीद में आप दोनों कहानियों का पीछा करते हैं. 

 

पहाड़ों से हो रहे पलायन के बीच एक पीड़ादायक प्रेम कथा

पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन कई दशकों से पहाड़ की मुख्य चिंताओं में बना हुआ है जहाँ अपनों का इंतज़ार करते बुजुर्गों के सिवा अब मुश्किल से कोई रह गया है. जहाँ गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासाउंड जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए अस्पताल ढूँढते पूरा-पूरा दिन चलना पड़ता है.

सड़कों और अस्पतालों के अभाव में जहाँ बीमार बुजुर्गों-महिलाओं की मौत आज भी रास्ते में ही कहीं ‘डोली’ में हो जा रही है. पायर की ‘डोली’ दुरूह पहाड़ों में व्यवस्था की विफलता से उपजे अभाव का भी एक बिम्ब है जो तुलसी को अस्पताल लाते-ले जाते फ़िल्म में बार-बार नज़र आता है. ढहते हुए पाखे वाले मकान की वो खिड़की जिसके आगे लंबी रातों को काटने के लिए पदम और तुलसी ‘लड़ लेते’ हैं, दुर्गम पहाड़ों की उस दुनिया में झांकने भी एक खिड़की है जिसके दुख और अभाव पर्यटन को बाज़ार बना देने पर आमादा व्यवस्था को नज़र नहीं आते। 

हल्द्वानी और देहरादून जैसे शहर, विकास की उम्मीद में हारे हुए प्रवासी पहाड़ियों की बेबसी और व्यवस्थागत नाकामी को लगातार महंगे होते जा रहे प्लॉटों में बनी दीवारों और छतों से ढँक देने की कवायद की तरह लगते हैं।

 

पायर फ़िल्म का मजबूत तकनीकी पक्ष

फ़िल्म की ख़ास बात पहली बार फ़िल्मों में अदाकारी कर रहे पदम सिंह और हीरा देवी का बेहद सधा हुआ और सहज अभिनय है जो पहाड़ आधारित फ़िल्मों में बहुत कम देखने को मिलता है. उत्तराखंड की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित ज़्यादातर फ़िल्में जिस पहाड़ी टोन को पकड़ने में संघर्ष करती दिखाई देती हैं वो यहाँ सहजता से आती है. 

‘कटकी रौ’, ‘आग लाग ज्यो’, ‘ओ ईजा’ जैसे भाषागत पहाड़ी (कुमाऊनी) संदर्भ फ़िल्म की भाषा में आंचलिक प्रामाणिकता लेकर आते हैं. हालांकि कुमाऊनी में बड़बड़ाते हुए फ़िल्म के कलाकार जो संवाद कहकर चले जाते हैं वो कई बार बिना सबटाइटल्स के फ़िल्म की एक सीमा भी बन जाते हैं. वो बात और है कि फ़िल्म में भावनाएँ इतनी हावी हैं कि भाषा की सीमा बहुधा नेपथ्य में चली जाती है. 

बुजुर्गवार की बेबसी और बिछोह के भाव को और गाढ़ा करने में माइकल डैना और अमृता वाज़ द्वारा तैयार किया गया फ़िल्म का बैग्राउंड म्यूज़िक एक बेहद अहम भूमिका अदा करता है. साथ ही मानस भट्टाचार्य की कमाल की सिनेमेटोग्राफ़ी फ़िल्म के वितान को एक अलग ऊँचाई पर ले जाने में मदद करती है. 

फ़िल्म में पदम सिंह के संवादों में दूसरे विश्वयुद्ध, जापान पर परमाणु बम गिरने और नेहरू वगैरह के संदर्भ ज़रूर आते हैं और विनोद कापड़ी पहाड़ से हो रहे पलायन के नाटकीय और भावनात्मक पक्ष को तो मजबूती से सामने रखते हैं लेकिन पत्रकार होने के बावजूद वो पलायन से जुड़े राजनैतिक पक्ष में मजबूत हस्तक्षेप करने से बचते हैं। तुलसी के साथ पदम सिंह के चुटीले संवाद उस अत्यंत पीड़ादायक माहौल को कई बार कुछ हल्का करते हैं जो फ़िल्म एक दर्शक के ज़ेहन में पैदा करती है।

मुख्य कलाकारों के अलावा डाकिये के तौर पर सदाब ख़ान ने अच्छा अभिनय किया है. पड़ौसियों के तौर पर सुभाष चंद्र, शुभम चौधरी, गोपा नयाल आदि की भूमिका भी ध्यान खींचती है. 

फ़िल्म में बादलों की गर्जनाओं, मूसलाधार बारिश की आवाज़, ढलती शाम के घिरते अंधेरे और पौ फटने से पहले के धुँधले उजाले के साथ पहाड़ की निर्मम चढ़ाइयों की थकान और ढलानों की फिसलन लगातार एक ऐसा संयोजन बना रही होती हैं कि फ़िल्म देखते हुए लगातार एक आपदा का डर सताये रहता है. यह आपदा धीरे-धीरे ढहते फिर भी गाँव के इकलौते आबाद उस जर्जर मकान को भी ढहा सकती है जिसमें पदम सिंह और तुलसी रहते हैं और उस बाँध को भी जो एक दर्शक के तौर पर टूटकर कभी भी आपकी आँखों से बह सकता है. 

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